विक्रम बैताल || कहानी 602 || 32 पुतलियों की कहानी [भाग 2] अगली आठ कहानियां

विक्रम बैताल || कहानी 602 || 32 पुतलियों की कहानी [भाग 2] आगे की आठ कहानियां 

सिंहासन बत्तीसी की कहानी / The Thirty Two Tales of THE THRONE
दूसरे भाग में आप सुनेंगे विक्रमादित्य के सिंहासन से संबंधित अगली आठ कहानियां।

9. उदार विक्रमादित्य

नौंवी पुतली ने राजा भोज से कहा कि क्या उनमें विक्रमादित्य जैसी उदारता है। इसे सुनकर राजा भोज ने पुतली को विक्रमादित्य की उदारता की कहानी सुनाने को कहा। 

पुतली ने कहा, एक बार राजा विक्रमादित्य ने अपने एक सेवक को बनारस जाकर राजा की ओर से भगवान विश्वनाथ की पूजा करने का आदेश दिया। पूजा पूरी करके बनारस से लौटते हुए सेवक रास्ते में एक नगर में एक राजा की पुत्री, जिसका नाम नरमोहिनी था, की अपूर्व सुन्दरता से मुग्ध हो गया, लेकिन जो भी नरमोहिनी के मोहपाश में पड़कर उसके पास रात को जाता। वह सुबह मृत पाया जाता रात्रि को क्या होता था इस रहस्य को कोई नहीं जान पाया। 

यद्यपि विक्रमादित्य का सेवक भी नरमोहिनी को पाने की चाहत रखता था लेकिन मृत्यु के डर से उसने विक्रमादित्य के पास लौटकर उन्हें पूरी कहानी बताई।

कहानी सुनकर विक्रमादित्य अपने सेवक के साथ उस नगर में पहुंचे और नरमोहिनी के साथ रात्रि विश्राम करने के लिए गये। रात्रि में नरमोहिनी के सोने के पश्चात् विक्रमादित्य अपनी तलवार लेकर कक्ष के स्तम्भ के पीछे छिप गए। मध्यरात्रि को उस कक्ष मे विशाल राक्षस आया और नरमोहिनी को अकेली सोता हुआ देखकर वहाँ से जाने लगा लेकिन विक्रमादित्य ने उसे युद्ध के लिए ललकारा और पराजित कर उसका वध किया।

नरमोहिनी ने विक्रमादित्य को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि "हे राजन ! आपकी कृपा से मुझे श्राप से मुक्ति मिली है। मैं आपकी इस कृपा का कर्ज कभी नहीं उतार सकती अतः मैं आपके आदेश की प्रतीक्षा कर रही हूँ । आप जो कहेंगे मैं वैसा ही करूंगी।" 

विक्रमादित्य ने उससे कहा "यदि तुम मेरे आदेश का पालन ही करना चाहती हो तो तुम मेरे सेवक से विवाह कर लो"। इस प्रकार उदार विक्रमादित्य दोनों का विवाह सम्पन्न कराकर अपने नगर को लौट गए।

कहानी समाप्त कर पुतली ने राजा भोज से कहा कि जिस व्यक्ति में विक्रमादित्य जैसा हृदय और उदारता हो वही इस सिंहासन पर बैठ सकता है।

10. विशाल हृदय विक्रमादित्य

राजा भोज को विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने से रोकते हुए दसवीं पुतली ने उनसे कहा की इस सिंहासन पर विक्रमादित्य के समान विशाल हृदय वाला व्यक्ति ही बैठ सकता है। पुतली ने कहाः

एक बार राजा विक्रमादित्य की भेंट एक संत से हुई। राजा ने संत से पूछा कि “ आपकी पूजा के मध्यम से व्यक्ति अमर हो सकता है। कृपया बतायें ऐसा कैसे हो सकता है? " 

संत ने जवाब दिया कि “यह माया (विद्या) से सम्भव है।" राजा ने संत से कहा कि वे ऐसी विद्या को करने को सज्ज है। 

संत ने उन्हे एक मंत्र देते कहा कि आपको इस मंत्र का एक वर्ष तक जाप करना है और इस दौरान केवल रात्रि में भोजन ग्रहण करना है, ब्रहमचर्य का पालन करना और भूमि पर सोना है, आत्मसंयम रखते हुए अंत में दस गुना अर्पण करना है।" आहुति देते ही एक व्यक्ति प्रकट होकर आपको एक देवीय फल देगा जिसे खाकर आप अमर हो जाऐंगें।

राजा ने संत के बताए गए तरीके से पूजा की और देवीय फल प्राप्त किया। अपने नगर को लौटते हुए राजा की भेंट एक बूढ़े बाह्मण से हुई जिसने राजा को आर्शीवाद दिया । इससे खुश होकर राजा ने अपना फल उस बूढ़े ब्राह्मण को दे दिया।

कहानी समाप्त करते हुए पुतली ने राजा भोज से कहा कि हे राजन! जिस व्यक्ति में राजा विक्रमादित्य - के समान विशाल हृदय हो वही इस सिंहासन पर बैठने का सच्चा अधिकारी है।
11. लोककल्याणी विक्रमादित्य

एक बार पुनः राजा भोज को विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने से रोकते हुए ग्यारहवी पुतली ने राजा विक्रमादित्य की तरह ही महान व्यक्ति को सिंहासन पर बैठने का सच्चा अधिकारी बताया। पुतली ने राजा भोज के कहने पर विक्रमादित्य को कहानी सुनाई:

एक बार अपने मंत्री की सलाह पर विक्रमादित्य विश्व भ्रमण पर निकले। एक दिन सूर्यास्त के समय राजा ने एक जंगल के बीचोबीच एक वृक्ष के नीचे पड़ाव डाला। उस वृक्ष पर एक दीर्घायु नाम का पक्षी बैठा था । जिसके सभी साथी पक्षी रात्रि के समय आपस में बात कर रहे थे कि "आज किसी ने कुछ किया, सुना या देखा ?" 

एक पक्षी ने कहा “अभी मैं दिन और रात बहुत दुखी हूँ।
क्योंकि ? समुद्र के बीचों बीच पूर्व जन्म का मेरा एक साथी है। जो इस जन्म में मनुष्य है और उसका एक पुत्र है। वहाँ पर एक राक्षस निवास करता है जिसे वहाँ का राजा हर दिन एक मनुष्य को बलि के रूप में खाने को देता है और कल सुबह राक्षस का भोजन बनने की मेरे दोस्त की बारी है इसलिये मैं दुखी हूँ।”

पक्षी की बात सुनकर विक्रमादित्य उस स्थान पर पहुँच गए जहाँ पर एक चट्टान पर राक्षस का भोजन बनने के लिए प्रतिदिन एक मानव को बैठाया जाता है। विक्रमादित्य उसी चट्टान पर जाकर बैठ गए लेकिन जब राक्षस ने आकर उन्हें देखा तो पूछा कि वे कौन हैं उन्हें पूर्व में उसने इस स्थान पर नही देखा। उसने राजा से कहा कि " में तुम्हारे कल्याणी भाव से प्रसन्न हूँ बताओ तुम्हारी मनोकामना क्या है ? राजा ने कहा यदि तुम प्रसन्न हो तो आज से ही मनुष्यों का भक्षण बन्द कर दोगे।" राक्षस ने राजा की बात मान ली और राजा अपने नगर को लौट आए।

कहानी समाप्त कर पुतली ने कहा इस प्रकार राजा विक्रमादित्य ने अपने कल्याणी भाव से मनुष्यों की सहायता की। इस गुण का व्यक्ति ही सिंहासन पर बैठने का सच्चा अधिकारी है।
12. उद्धारक विक्रमादित्य

बारहवीं पुतली ने राजा भोज से कहा कि वहीं व्यक्ति महान विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठ सकता है जिसमें उनके समान दूसरों के उद्धार के लिए स्वयं को खतरे में डालने का साहस हो । पुतली ने कहानी सुनानी प्रारंभ की :

राजा विक्रमादित्य के राज्य में एक व्यापारी के पुत्र ने उसका सारा धन अपनी बुरी आदतों पर लुटा दिया। अन्ततः जब सारी दौलत समाप्त हो गई और व्यापारी बहुत गरीब हो गया ऐसी स्थिति में व्यापारी का पुत्र अपने नगर को छोड़कर बाहर चला गया। रास्ते में यात्रा के दौरान व्यापारी पुत्र एक नगर में पहुचाँ जहाँ पर एक उपवन से रात्रि में एक स्त्री के चीखने की आवाज आती थी। जो हर रात को पुकारती थी “कोई मुझे बचा लो। " लेकिन कारण कोई नही जानता।

यह बात सुनकर व्यापारी पुत्र ने लौटकर सारी बात विक्रमादित्य को सुनाई। सुनकर राजा विक्रम अपनी तलवार लेकर उस नगर में पहुँचे और रात में स्त्री की चीख सुनकर उस उपवन में पहुँचे। पहुँचकर राजा ने देखा की एक राक्षस वृक्ष के समीप महिला का वध करने जा रहा है। 

ऐसा देखकर विक्रमादित्य ने राक्षस को युद्ध की चुनौती दी। दोनो के बीच युद्ध में विक्रमादित्य ने राक्षस को पराजित कर वध कर दिया। इस पर उस स्त्री ने राजा को उसकी रक्षा करने के लिए धन्यवाद दिया। विक्रमादित्य ने स्त्री को राक्षस के चुंगल में फंसने का कारण पुछा तो महिला ने बताया कि उसने अपने पति के साथ विश्वासघात किया और अपने चारित्रिक पतन के कारण उसे अपने पति का श्राप मिला। श्राप के अनुसार एक राक्षस प्रतिदिन अपने कोड़े से उसे प्रताड़ित करेगा और अंत में उसकी हत्या कर देगा । लेकिन उस स्त्री के पति ने उस पर दया करते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति उस राक्षस का वध कर देगा तब उसे श्राप से मुक्ति मिल जायेगी। 

स्त्री ने विक्रमादित्य को धन्यवाद देते हुए कहा कि हे राजन। आपने मेरी रक्षा कि है। इसलिए मैं आपको नौ बर्तनों में स्थित अपना खजाना अर्पित करती हूँ।" विक्रमादित्य ने कहा कि मैं स्त्री के धन को नही ले सकता"। 

इस पर स्त्री ने कहा कि मैं अब जीवन के अतिंम समय में हूँ अतः आप इस धन का उपयोग करें"। राजा ने वह खजाना व्यापारी को सौंप दिया।

ऐसे थे राजा विक्रमादित्य जिन्होने न सिर्फ उस स्त्री का उद्धार किया बल्कि प्राप्त धन को भी व्यापारी को दे दिया। ऐसे महान राजा जैसा ही व्यक्ति इस सिंहासन पर बैठने का सच्चा अधिकारी है।
13. करुणाशील विक्रमादित्य

जब एक बार पुनः राजा भोज सम्राट विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने लगे तब पुतली ने उनसे कहा कि इस सिंहासन। पर विक्रमादित्य जैसी करुणा रखने वाला व्यक्ति ही बैठ सकता है। पुतली ने कहा:-

एक बार विक्रमादित्य तीर्थयात्रा के दौरान पवित्र घाटों पर जाकर नदियों के दर्शन लाभ ले रहे थे। इसी दौरान गंगा नदी के किनारे पवित्र मंदिर में ठहरे। रात्रि में विक्रमादित्य को एक ब्राह्मण की चीख सुनाई दी जो नदी मे डूब रहा था और पुकार रहा था “कोई मुझे बचा लो मैं डूब रहा हूँ"

विक्रमादित्य ने उसे बचाया तो ब्राह्मण ने कहा कि "मैनें बारह वर्षों तक कमर तक नर्मदा नदी में खड़ा रहकर तपस्या की हैं। इसके फल के रूप में मुझे यह शक्ति प्राप्त हुई जिसके आधार पर मैं जब चाहूँ सशरीर औलोकिक विमान से स्वर्ग जा सकता हूँ और इच्छा मृत्यु का भी मुझे वरदान प्राप्त हुआ है। मैं इन सभी शक्तियाँ को आपको देता हूँ"। 

ब्राह्मण के शब्दों को पास ही छिपा एक ब्राहम्ण राक्षस सुन रहा था जो अंजीर के पवित्र पेड़ पर निवास करता या जिसकी काया सूखकर कंकाल हो गई थी। वह तत्काल राजा विक्रमादित्य के समक्ष आकर खड़ा हो गया। 

इसे देखकर राजा ने पूछा कि "तुम कौन हो"। 

उस राक्षस ने कहा कि वह एक समय में एक राजा का पुरोहित था लेकिन लालचवश निषिद्ध उपहारो को स्वीकार करने के कारण मैं ब्राह्मण एक राक्षस बन गया। पाँच हजार वर्षो के पश्चात भी मुझे मुक्ति नहीं मिली है। 

उसकी कहानी सुनकर राजा विक्रमादित्य ने कहा "में तुम्हे ब्राह्मण से प्राप्त शक्तिया देता हूँ ताकि तुम स्वर्ग को प्राप्त करों"। विक्रम के शब्दों के साथ ही ब्राहम्ण राक्षस औलोकिक विमान पर बैठकर स्वर्ग की ओर प्रस्थान किया।

"ऐसे थे करुणाशील विक्रमादित्य" कहते हुए पुतली ने राजा भोज से कहा कि ऐसा ही व्यक्ति इस सिंहासन पर बैठने का सच्चा अधिकारी है।
14. महादानी विक्रमादित्य

राजा भोज को पुनः पुतली ने विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने से रोकते हुए कहा कि क्या उनमें विक्रमादित्य जैसे गुण है। पुतली ने कहा

एक बार राजा विक्रमादित्य अपने विश्व भ्रमण के दौरान भगवान शिव के मंदिर पहुँचे। स्नान कर राजा विक्रम शिव मंदिर में ही ईश्वर की आराधना करने के लिये बैठ गए। 

उसी समय एक संत ने उनसे पूछा कि वे कौन हैं। विक्रम ने अपना परिचय देते हुए कहा कि “ में राजा विक्रमादित्य हूँ और यात्रा पर निकला हूँ।" 

विक्रम की बात सुनकर संत ने कहा कि एक बार में आपके राज्य की राजधानी उज्जैन गया था और आपको वहाँ देखा था। आप अपने राज्य को छोड़कर क्यों भ्रमण कर रहे है ? अगर आपके राज्य में कोई विद्रोह हो जाता है तो आप क्या करेंगें संत ने कहा कि " एक राजा को अपना राज्य अकेला नहीं छोड़ना चाहिए"।

“संत की बात सुनकर विक्रमादित्य ने उनकी बातों का समर्थन करते हुए कहा कि” व्यक्ति को राजपाठ, ऐश्वर्य, गौरव व सुख अच्छे कार्यों के परिणाम स्वरूप मिलता है इनकी समाप्ति के बाद सारी चीजें स्वतः ही नष्ट हो जाती हैं। "

"ईश्वर किसी व्यक्ति को उसके कर्म व योग्यता के अनुसार ही भोजन, वस्त्र व धन प्रदान करता है।” 

विक्रमादित्य की बातें सुनकर संत बहुत प्रसन्न हुए और उन्होने राजा विक्रम को पवित्र 'कश्मीरलिंग' प्रदान करते हुए कहते हैं “कि इस शिवलिंग की आराधना करने से आपके हृदय की हर कामना पूरी हो जाएगी।" 

शिवलिंग को लेकर अपने राज्य लौटते समय राजा की मुलाकात एक ब्राह्मण से होती हैं जो राजा को अपना आशीर्वाद देता है । जिससे प्रभावित होकर विक्रम कश्मीरलिंग को ब्राह्मण को दान दे देता हैं।

कहानी की समाप्ति पर पुतली ने राजा भोज से कहा कि ऐसे महादानी विक्रमादित्य जैसे गुणों वाला व्यक्ति ही उनके सिंहासन पर बैठ सकता है।
15. कल्याणकारी विक्रमादित्य

इस बार फिर राजा भोज को विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने से रोकते हुए पुतली ने कहा कि जो व्यक्ति विक्रमादित्य जैसे गुणों से सुसज्जित होगा वही इस सिंहासन पर बैठने का सच्चा अधिकारी होगा। इस पर राजा भोज के कहने पर पुतली ने विक्रमादित्य के गुण की कहानी सुनाईः

एक बार राजा विक्रमादित्य के राज पुरोहित के पुत्र वासुमित्र ने अपनी धार्मिक यात्रा से लौटकर राजा को बताया कि " हे राजन ! एक नगर में एक मन्मथसंजीवनी नामक औलोकिक परी है। जो श्रापित है। वहां पर एक मण्डप में महान वीरों को उत्तेजित करने की प्रक्रिया चलती है। यहाँ पर विशाल पात्रों में तेल उबल रहा है । जो भी इनमें से किसी पात्र में कूदेगा । उसे मन्मथसंजीवनी अपना वर चुनेगी और वह वहाँ का राजा बनेगा"।

इसको सुनकर सम्राट विक्रमादित्य अपने साथ वसुमित्र को लेकर उसी नगर में पहुँचे और उबल रहे पात्रों में से एक में छलांग लगा दी । विक्रमादित्य का शरीर उस जलते हुए तेल में गिरकर माँस का एक पिण्ड बन गया । मन्मथसंजीवनी ने उस पिण्ड पर अमृत छिड़कर विक्रमादित्य को पुनर्जीवित किया। विक्रमादित्य के पुनः जीवित होने के पश्चात परी ने कहा कि “मैं और मेरा राज्य आपको समर्पित है। आपके समस्त आदेशों का पालन करने के लिए मैं सज्ज हूँ"।

इस पर विक्रमादित्य ने कहा कि वद वसुमित्र से विवाह कर ले और इस प्रकार वसुमित्र को राजा बना दें। ऐसा कर विक्रमादित्य अपने राज्य लौट आए।।

कहानी समाप्त कर पुतली ने कहा कि विक्रमादित्य जैसी विशालहृदयता जैसी ही प्रकृति का व्यक्ति ही इस सिंहासन पर बैठ सकता है।
16. विशालहृदय विक्रमादित्य

एक बार फिर जब राजा भोज विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने लगे तो पुतली ने उनसे पूछा कि क्या वे विक्रमादित्य की तरह विशालहृदय हैं जो इस सिंहासन पर बैठ रहे हैं। यह सुनकर राजा भोज ने पुतली से विक्रम की कहानी सुनाने को कहाः

विक्रमादित्य ने एक बार विचार किया कि "यदि वसन्त ऋतु को पूजा अर्पित की जाए तो उनका राज्य पूरी तरह से बाधाओं  से मुक्त हो जाएगा "। 

ऐसा विचार कर उन्होनें ऋतु की पूजा व सम्मान के लिये तैयारियाँ प्रारम्भ की। वेदों और शास्त्रों के विद्वान ब्राह्मणों, वंशावली के जानकार कवियों तथा प्रभावशाली विशेषज्ञों को आमंत्रित किया गया । अत्यन्त सुन्दर पूजन-मण्डप बनवाया गया जहाँ पर एक रत्नों से सुशोभित सिंहासन स्थापित किया और सात माताओं की मूर्तिया का पुष्पों से पूजन किया गया। तत्पश्चात उपहारों व दानों को अर्पित करते हुए कहा कि " हे महेश्वर आप प्रसन्न हों"। 

हर उपस्थित व्यक्ति को दान आदि से खुश किया गया । दुःखियों को प्रसन्न किया गया। इसी समय एक ब्राह्मण उपस्थित हुआ और राजा से अपनी पुत्री के विवाह के लिये धन की अपेक्षा व्यक्त की क्योकिं उसे स्वप्न में ईश्वरीय संकेत प्राप्त हुआ था कि उसको पुत्री के विवाह के लिये धन राजा विक्रमादित्य प्रदान कर सकते हैं। 

ब्राह्मण की बातें सुनकर विक्रमादित्य ने उस ब्राह्मण को आठ करोड़ सिक्के समर्पित कर दिया।

कहानी समाप्त कर पुतली ने कहा कि विक्रम की तरह विशाल हृदय वाला इस सिंहासन पर बैठने का अधिकारी है।

आगे की कहानियां भाग 3 में पढ़े। 

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