विक्रम बैताल || कहानी 603 || 32 पुतलियों की कहानी [भाग 3] अगली आठ कहानियां

विक्रम बैताल || कहानी 603 || 32 पुतलियों की कहानी [भाग 3] अगली आठ कहानियां 

सिंहासन बत्तीसी की कहानी / The Thirty Two Tales of THE THRONE

तीसरे भाग में आप सुनेंगे विक्रमादित्य के सिंहासन से संबंधित अगली आठ कहानियां।
17. महाउदार व महात्यागी विक्रमादित्य
जब राजा भोज फिर एक बार विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने लगे तो पुतली ने उनसे रोकते हुए कहाः

एक बार विक्रमादित्य के राजकवि एक अन्य राज्य में पहुँचे जहाँ पर उन्होंने विक्रम की महानता का गुणगान किया। इस पर उस राज्य के राजा ने कवि से पूछा कि आप अपने सम्राट की प्रशंसा का गुणगान कर रहें है ऐसा क्या हैं सम्राट में ? इस पर राजकवि ने कहा कि "विक्रमादित्य जैसा वीर व साहसी राजा कोई दूसरा नहीं है। "

यह सुनकर राजा ने एक विशाल पात्र में उबलता हुआ तेल रखवाया और एक जादूगरनी को प्रसन्न करने के लिये स्वयं को उस उबलते हुए तेल के कढ़ाव में अर्पित कर दिया। इसे देखकर उस मोहनी जादूगरनी ने प्रसन्न होकर राजा से वरदान मांगने को कहा इस पर राजा ने कहा कि "हर दिन मेरे सात महल स्वर्ण से भर जाएँ ताकि शाम तक वह स्वर्ण दान करता रहे"

इस प्रकार राजा प्रतिदिन स्वयं को गरम तेल के कढ़ाव में समर्पित करता और उसे दान के लिये भरपूर स्वर्ण भण्डार मिल जाते हैं।

जब यह कहानी राजकवि ने राजा विक्रमादित्य को सुनाई तो विक्रमादित्य ने उस नगर में पहुँचकर स्वयं को उस उबलते हुए तेल के कढ़ाव में समर्पित कर दिया। उनके समर्पण से प्रसन्न होकर जादूगरनी ने उनसे उनकी मनोकामना पूंछी। इस पर विक्रमादित्य ने कहा कि इस राज्य के राजा के सातों महल स्थायी रूप में स्वर्ण से भर जाएं ताकि प्रतिदिन उस राजा को उबलते हुए तेल में स्वयं को समर्पित न करना पड़े। राजा के दान में कभी कमी न आए। राजा विक्रमादित्य को इच्छा पूरी हो गई।

पुतली ने कहानी समाप्त कर कहा कि ऐसी उदारता और विशालहृदयता जैसा व्यक्ति ही इस सिंहासन पर बैठ सकता है।


18. अपूर्व दान और विक्रमादित्य

जब राजा भोज फिर एक बार विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने लगे तो पुतली ने उन्हे रोकते हुए कहा:

एक बार सम्राट विक्रमादित्य के पास एक अनजान व्यक्ति आया और उसने सम्राट को एक कहानी सुनाई। उसने कहा "हे राजनः समुद्र के पास एक स्वर्ण स्तम्भ है। सूर्य उदय के समय एक स्वर्ण सिंहासन सूर्य की दिशा में ऊपर उठना शुरू करता है और दोपहर में जब सूर्य अपने सर्वोच्च शिखर पर होता है तब यह सिंहासन भी सूर्य के सबसे नजदीक होता है और जैसे-जैसे सूर्य ढलकर डूबता है वैसे ही सिंहासन स्तम्भ भी पानी में समा जाता है।"

कहानी सुनकर विक्रमादित्य भी उस स्थान पर पहुँचे और सूर्योदय के समय जैसे ही सिंहासन पानी से बाहर अवतरित हुआ विक्रमादित्य उस पर बैठ गए और दिन के बढ़ने के साथ ही वह सिंहासन भी सूर्य के नजदीक पहुँचने लगा । ठीक बीच दोपहर जैसे ही सिंहासन सूर्य के सबसे नजदीक पहुँचा तो सूरज की गर्मी से विक्रमादित्य का शरीर जलकर माँस के गोले में तबदील हो गया। 

सूर्यदेव ने प्रकट होकर पूछा “राजा तुम यहाँ क्यों आए हो” विक्रम ने उत्तर दिया" आपको देखने के लिये और कोई इच्छा नहीं है।" 

सूर्य ने उनसे प्रसन्न होकर उन्हे दो स्वर्ण अंगूठियाँ दीं और कहा यह दोनों अंगूठियाँ राजा की कोई भी मनोकामना पूरी कर सकेगी।

लौटते समय उनको ब्राह्मणों का एक समूह मिला जो ईश्वर की आरती पूजन कर रहा था। ब्राह्मणों ने राजा को आशीर्वाद दिया और कहा" "हमने आपको आशीर्वाद इसलिए दिया कि हमें ज्ञात है कि आप के दृढ़ निश्चय से आप यहाँ से दो से चार गुना धन प्राप्त करेगें। जब आप जादुई सिंहासन से ईश्वर का वरदान पाएँगे। प्राप्त धन से आप कुछ धन ईश्वर के चरणों में समर्पित करेगें और उस धन से ही हमारी आजीविका चलती है।"

यह सुनकर राजा ने सूर्य से प्राप्त दोनों अंगूठियाँ उन भक्तों को देकर अपने शहर उज्जैन लौट आए।

ऐसा महादानी राजा दूसरा नहीं हैं, ऐसी कहानी सुनाने के बाद पुतली ने राजा भोज को कहा कि ऐसा गुण जिस व्यक्ति में हो वहीं इस सिंहासन पर बैठ सकता है।
19. मर्यादा व विक्रमादित्य

राजा भोज जब विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने लगे तब पुतली ने उन्हें रोकते हुए कहा कि क्या उनमें विक्रमादित्य जैसी मर्यादा हैं तब ही आप इस सिंहासन पर बैठ सकते हैं अन्यथा नहीं। पुतली ने कहानी शुरू की:

एक बार विक्रमादित्य जंगली सूअर का शिकार करते हुए घने जंगल में पहुँच गए। इसी दौरान उन्हें एक गुफा दिखाई दी, जैसे ही गुफा में प्रवेश किया वैसे ही वे पाताल लोक में पहुँच गए। पाताल लोक में राजा बली ने उनका हाल-चाल पूछकर उनको गले लगाकर स्वागत किया। भेंट स्वरूप राजा ने विक्रमादित्य को एक द्रव्य और पारसमणि दी। 

राजा ने विक्रम से कहा कि “द्रव्य अथवा खुराक से नया शरीर पाया जा सकता है और पारस से स्वर्ण निर्मित किया जा सकता है"।

विक्रमादित्य दोनों उपहारों को लेकर जब अपने नगर आ रहे थे तभी मार्ग में दो ब्राह्मण पिता पुत्र मिले जिन्होंने राजा विक्रमादित्य को आशीर्वाद दिया। खुश होकर विक्रमादित्य ने उनसे राजा बली से मिले उपहारों में से किसी एक को लेने के लिए कहा। निश्चित न कर पाने के कारण दोनों पिता व पुत्र आपस में झगड़ने लगे। पिता ने जादुई खुराक लेने के लिए कहा लेकिन पुत्र ने पारस पत्थर की माँग की। दोनों को झगड़ता देख विक्रमादित्य ने दोनों उपहार उन्हें ही दे दिए।

कहानी समाप्त कर पुतली ने राजा भोज से कल कि राजा विक्रमादित्य जैसी मर्यादा व महानता वाले गुणों से सुसज्जित व्यक्ति ही इस सिंहासन पर बैठ सकता है अन्य कोई नहीं।
20. श्रेष्ठता व विक्रमादित्य

राजा भोज को पुतली ने पुनः विक्रमादित्य के सिंहासन पर बैठने से श रोकते हुए कहा एक बार विश्व भ्रमण के दौरान राजा विक्रमादित्य अनेक तीर्थ व नगरों में पहुंचे। 

एक दिन वे एक पवित्र शिव के मंदिर में पहुंचे और कुछ क्षणों के लिए विश्राम करने बैठ गए। उसी समय तीन परदेशी वहाँ पर आए और आपस में बात करने लगे । एक ने कहा कि "हमने दुनिया में बहुत से तीर्थस्थल व अद्भुत स्थानों को देखा " । दुसरे ने कहा “लेकिन संत त्रिकालनाथ को देख पाना बहुत मुश्किल है क्योंकि मार्ग में बहुत सारे साँप कुण्डली मारे बैठे हैं और संत तक पहुँचने में प्राण का सबसे बड़ा खतरा हैं। वास्तव में ज्ञानियों ने सत्य कहा कि एक बुद्धिमान व्यक्ति को फलहीन कार्य नहीं करना चाहिए । जो कार्य विध्वंस लाते हों, जिनका अन्त शुभ न हो और जो कार्य किए जा सकने में असम्भ हों" इतनी बातें कर तीनों राहगीर चुप हो गए।

उनकी बातें सुनकर विक्रमादित्य त्रिकालनाथ के दर्शन पाने के लिये निकल पड़े। मार्ग में सापों ने विक्रम का रास्ता रोका और बहुत कठिनाई से विक्रम त्रिकालनाथ के दर्शन कर पाए। त्रिकालनाथ ने विक्रम को आर्शीवाद देते हुए कहा कि "हे राजन ! इतना कष्ठ उठाकर वे क्यों आए ?" 

तो विक्रमादित्य ने कहा कि "आपके दर्शन करने के लिये"। 

इस पर त्रिकलनाथ ने प्रसन्न होकर विक्रमादित्य की उपहार में एक जादुई कपड़ा एक जादुई झड़ी-तलवार व एक जादुई चॉक का टुकड़ा दिया। चॉक से यदि दाए हाथ से एक लकीर खींची जाती और लकीर को यदि को पूरी सेना को पुनर्जीवित किया जा सकता था। उसी तरह यदि चाँए हाथ से लकीर खींची जाती तो किसी भी दुश्मन की सेना का विनाश किया जा सकता था। जादुई कपड़ा मनोकामना पूरी कर सकता था।

इस प्रकार इन शक्तिशाली वस्तुओं को लेकर विक्रमादित्य अपने नगर की ओर चल पड़े लेकिन रास्ते में एक अद्भुत व्यक्ति से उनकी भेंट हुई। उसने कहा कि "उसके उत्तरधिकारियों ने उससे उसका राज्य छीन लिया है और उसे मारना चाहते हैं। वह किसी तरह जान बचाकर भागा है। आज वह बहुत दुःखी है। उसकी व्यथा सुनकर राजा विक्रमादित्य ने उन्हें मिली सभी चमत्कारिक वस्तुएँ उस व्यक्ति को दे दीं। 

कहानी समाप्त करते हुए पुतली ने राजा भोज से कहा कि ऐसा महानदानी सम्राट कोई दूसरा नहीं है। सम्राट विक्रमादित्य जैसा विशालहृदय ही इस सिंहासन पर बैठने का अधिकारी है।
21. महात्यागी विक्रमादित्य

एक बार पुनः जब राजा भोज सिंहासन पर बैठने लगे तो पुतली ने उन्हें रोकते हुए कहा कि इस सिंहासन पर बैठने का अधिकारी वही हैं जिसमें विक्रमादित्य जैसी महानता है। 

पुतली ने कहा, एक बार विक्रमादित्य के मंत्री बुद्धिसिन्धु के पुत्र ने राजा को बताया कि "हे राजन ! योगिनीपुर नामक नगर में पवित्र स्थल कात्यायनी के पास एक जलाशय के बीचो-बीच से आठ आलोकिक परियाँ निकलती हैं । अपने नृत्य व गीतों से देवी को अपनी सोलह संस्कारों से युक्त पूजा समर्पित करती हैं और पूजा सम्पन्न करने के पश्चात फिर जलाश्य में चली जाती हैं।

इस कहानी को सुनकर विक्रमादित्य ने उस स्थान पर जाने का फैसला किया। उस पवित्र स्थान पर पहुँचकर स्नान कर विक्रमादित्य उन परियों का इंतजार करने लगे। मध्यरात्रि को वे आलोकिक परियाँ प्रकट हुई और देवी की पूजा करने के पश्चात व जलाश्य मे प्रवेश करने लगीं। 

उनका पीछा करते हुए विक्रमादित्य भी जलाश्य में उतर गए। उन्होंने जल में प्रवेश कर एक अद्भुत महल में पहुँचे और परियों ने कहा "हे राजन ! आप हमारा राज्य स्वीकार करें।" 

राजा ने कहा कि उनके स्वयं के पास राज्य है। इस पर परियों ने कहा कि वे राजा से प्रसन्न है और उन्हें खुशी होगी यदि वे उनका राज्य स्वीकार कर लें। इस पर विक्रमादित्य के ईंकार करने पर उन परियों ने राजा को आठ ओलोकिक रत्न दिये और कहा कि इन जादुई रत्नों से मनचाही वस्तु प्राप्त की जा सकती है।

राजा जब इन रत्नों को लेकर अपने राज्य की ओर आ रहे थे, तब मार्ग में एक ब्राह्मण से उनकी भेंट हुई। उस ब्राह्मण ने राजा से खाने के लिये कुछ देने को कहा। उस पर दया दिखाते हुए राजा ने उसे आठ रत्नों को दे किया।

तो ऐसे थे दानी विक्रमादित्य । जिस व्यक्ति में उन जैसी महादानी प्रवृत्ति होगी वही इस सिंहासन पर बैठने का सच्चा अधिकारी होगा।
22. विक्रमादित्य का साहस और दानवीरता

राजा भोज को पुतली ने पुनः सिंहासन पर बैठने से रोकते हुए कहा :-

एक बार राजा विक्रमादित्य राज्य के भ्रमण पर अकेले ही निकले थे कि गंगा तट पर एक ब्राह्मण उन्हें हताश बैठा दिखाई दिया। राजन ने पूछा, " हे विप्रवर ! आप इतने निराश क्यों है? ब्राह्मण बोले राजन क्या करू मेरा घोर परिश्रम व्यर्थ चला गया, मुझे उसका कोई फल नहीं मिला, यहाँ से सुदूर पहाड़ियों में देवी कामाक्षी का मंदिर है, वहां गुफा में एक चांदी का पात्र है। जिसमे देवीय शक्तियां है। जिसे देवी को प्रसन्न कर प्राप्त किया जा सकता है किन्तु मैंने 12 वर्ष तप किया पर देवी प्रसन्न नहीं हुई।

यह सुनकर राजा बोले मुझे वह स्थान बताइए। दोनों सूर्यास्त तक उस स्थान तक पहुंच गए और दोनो विश्राम करने लगे। देवी ने राजा को एक स्वप्न दिया कि यदि नर बलिदान कर अनुष्ठान किया जाये तो चांदी के पात्र की देवीय शक्तियां प्राप्त हो सकती है। यह सुनते ही राजा गुफा के द्वार पर और हाथ में तलवार लेकर बोले देवी मेरी बलि स्वीकार करे और अपना सर धड़ से अलग करने लगे। देवी प्रसन्न होकर प्रकट हुई और वर मांगने के लिए कहा।

राजा बोले यदि आप मुझ पर प्रसन्न है तो यह चांदी का पात्र इस ब्राह्मण को दें। देवी तथास्तु कह कर अंतर्ध्यान हो गई और ब्राह्मण शक्तियां प्राप्त कर प्रसन्न हो गया। राजा अपने नगर को लौट आएं। 

पुतली बोली हे राजा भोज इस सिंहासन का वहीं अधिकारी हैं जो ऐसे साहस और दानवीरता का स्वामी हो।
23. विक्रमादित्य कि दानवीरता

राजा भोज को पुतली ने सिंहासन पुनः पर बैठने से रोकते हुए कहा :-

एक बार राजा विक्रमादित्य ने एक दुःस्वप्न देखा कि वे एक भैंसें पर बैठकर दक्षिण दिशा के ओर जा रहे हैं। अगले दिन प्रातः उन्होंने वेदपाठी विद्वानों ओर ज्योतिषाचार्यों को बुलाकर अपना स्वप्न सुनाया।

विद्वान बोले गऊ, वृषभ, गज, मंदिर, पर्वत, और वृक्ष का आरोहण, गोबर, रुदन और शव का स्वप्न में दर्शन शुभ हैं।

परन्तु राजन, गधा, महिष, भैंसे, आलू और कर्षि का स्वप्न में आरोहण अशुभ हैं। साथ ही भस्म, कपास, सीप और अस्थियों का दर्शन भी अशुभ है।

अतः है राजन ! स्वप्न में भैंसे पर स्वयं को आरूढ़ देखना अहितकारी है। इसके अशुभ प्रभाव को नष्ट करने के लिए यथोचित को स्वर्ण का दान करें।

यह सुनकर राजा विक्रम ने अपने खजाने के द्वार एक पुरे दिन और पूरी रात भर के लिये सर्व साधारण के लिये खोल दिए। 

इतना कह कर पुतली ने कहा है नरेश, इस सिंहासन पर वही व्यक्ति बैठ सकता है जिसमे राजा विक्रमादित्य जैसी उदार दानवीरता हो
24. उदार दानवीरता 

राजा भोज को पुतली ने पुनः सिंहासन पर बैठने से रोकते हुए कहा :-

एक नगर में एक धनाड्य व्यपारी रहता था, वह राजा का अति प्रिय था। वृद्धा अवस्था में जैसे मृत्यु का समय निकट आ रहा था, उसे चिंता सताने लगी की मेरी मृत्यु के बाद धन के बटवारे को लेकर पुत्रों के बीच विवाद न हो। अतः मुझे अपनी सम्पत्ति का बटवारा कर देना चाहिए। ऐसा सोच कर वणिक ने चार तॉम्बे के पात्रों को लेकर पहले में भूसा, दूसरे में सब्जियां, तीसरे में मिटटी और चौथे में कोयला भर कर उन्हें बंद कर दिया और चारों पुत्रों को बुलाकर एक एक पात्र थमा दिया और कहा की जिसे जो पात्र प्राप्त हुआ हे उसी हिसाब से सम्पत्ति का बटवारा आपस में कर लो।

पात्र को खोलकर पुत्र कुछ भी समझ नहीं सके, थक कर के राजा विक्रमादित्य के पास पहुँचे। परन्तु विक्रम भी इस पहेली का हल नहीं निकाल सके । चारो पुत्र भटकते हुए 'पितृस्थान' नामक स्थान पर पहुंचे वहां कालीवाहन से उनकी भेट हुई। कालीवाहन ने हल सुझाया और बोले, भुसे का अर्थ है अनाज, सब्जियों का अर्थ है पशुधन, मिट्टी का अर्थ जमीन: और कोयले का अर्थ है स्वर्ण।

चारों पुत्र प्रसन्न होकर लौट गए, इस वृतांत को सुन कर राजा विक्रम ने कालीवाहन को मिलने के लिए बुलावा भेजा, परन्तु दम्भवश वह नहीं आया, तब विक्रमादित्य स्वयं पितृ स्थान की ओर चल पड़े,

वहाँ पहुँच कर विक्रमादित्य और कालीवाहन के बिच युद्ध छिड़ गया, कालीवाहन ने शेष नाग का आहवान किया और शेष नाग ने राजा की समस्त सेना को डस लिया, अब राजा विक्रम अपनी सेना के लिये चिंतित हुए उन्होंने नागों के देवता वासुकि की आराधना की, प्रसन्न होकर वायुकि ने विक्रम को अमृत कलश दिया. राजा विक्रमादित्य जैसे ही अमृत कलश लेकर जाने लगे, एक ब्राह्मण उनके समक्ष उपस्थित हुआ, भिक्षा में राजा से वह अमृत कलश मांगने लगा। हे विप्रवर ! आप कौन है ? ब्राह्मण बोला मुझे कालीवाहन ने भेजा है।

राजा बोले आपको मेरे शत्रु ने भेजा है परन्तु मैं शरण में आए ब्राह्मण को भिक्षा देने के लिए प्रतिबद्ध हूँ, कहा गया है कि जो अपना वचन भंग करता है वह अपने अर्जित पुण्य नष्ट कर लेता है। अतः यह लो अमृत कलश। 

पुतली बोली- हे राजन यदि राजा विक्रम जैसी उदार दानवृत्ति आप में है, तो आप इस सिहांसन पर आरूढ़ हो सकते हैं।
आगे की कहानियां भाग 4 में पढ़े। 

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