111. विक्रम बैताल || कहानी 11 || समझ समझ का फेर ?

111. विक्रम बैताल || कहानी 11 || समझ समझ का फेर ?

उचित समय आने पर राजा अकेला योगी के मठ पर जा पहुँचा। योगी ने उसे अपने पास बिठा लिया। थोड़ी देर बैठकर राजा विक्रम ने पूछा, “महाराज, मेरे लिए क्या आज्ञा है?”

योगी ने कहा, “राजन्, यहाँ से दक्षिण दिशा में दो कोस की दूरी पर शमशान में एक सिरस के पेड़ पर एक मुर्दा उल्टा लटका हुआ है। उसे मेरे पास ले आओ, तब तक मैं यहाँ पूजा करता हूँ।”

यह सुनकर राजा विक्रम अपने वचन को पूरा करने के लिए शमशान की ओर चल दिया। बड़ी भयंकर रात थी। चारों ओर अँधेरा फैला था। पानी बरस रहा था। भूत-प्रेत शोर मचा रहे थे। साँप आ-आकर पैरों में लिपटते थे। लेकिन हर बाधा को दूर करते हुए निडर राजा विक्रम आगे बढ़ता गया। 

जब वह शमशान में पहुँचा तो देखता क्या है कि शेर दहाड़ रहे हैं, हाथी चिंघाड़ रहे हैं, भूत-प्रेत आदमियों को मार रहे हैं। राजा बेधड़क चलता गया और सिरस के पेड़ के पास पहुँच गया। पेड़ पर रस्सी से बँधा मुर्दा लटक रहा था। पेड़ जड़ से फुनगी तक आग से दहक रहा था। राजा ने सोचा, हो-न-हो, यह वही योगी है, जिसकी बात देव ने बतायी थी। राजा पेड़ पर चढ़ गया और तलवार से रस्सी काट दी। मुर्दा नीचे गिर पड़ा और दहाड़ मार-मार कर रोने लगा।

उसने राजा से पूछा, “तू कौन है?” 

"विक्रम", राजा ने जवाब दिया।

राजा का इतना बोला ही था कि वह मुर्दा खिलखिकर हँस पड़ा, और तभी वह मुर्दा हवा में उड़ा और पुनः पेड़ पर जा लटका। 

राजा को बड़ा अचरज हुआ। तभी सिद्ध योगी की आवाज सुनाई दी, " विक्रम ! इससे बात मत करो वरना यह पुनः पेड़ पर जा लटकेगा। समय बहुत कम है जल्दी करो।"

राजा पुनः चढ़कर ऊपर गया और रस्सी काट, मुर्दे को बगल में दबा, नीचे आया। मुर्दा पुनः बोला, “बता, तू कौन है?”

राजा चुप रहा। मुर्दा बार-बार बोलता रहा परंतु राजा ने जवाब नहीं दिया।

नीचे उतर कर राजा ने उसके  दोनों हाथ पकड़े और अपनी पीठ पर लाद लिया और मुर्दे को योगी के पास ले चला। रास्ते में वह मुर्दा बोला, “मैं बेताल हूँ। तू कौन है और मुझे कहाँ ले जा रहा है? अब तू आराम से मेरे प्रश्नों का जवाब दे सकता है।”

राजा ने कहा, “मेरा नाम विक्रम है। मैं धारा नगरी का राजा हूँ। मैं तुझे योगी के पास ले जा रहा हूँ।”

बेताल बोला, “राजन ! मैं एक शर्त पर चलूँगा कि तू रास्ते में अब के बाद कुछ भी नहीं बोलेगा। यदि तेरे मुंह से एक शब्द भी निकला तो मैं लौटकर पेड़ पर जा लटकूँगा। 

राजन! जिसने तुम्हें मेरे पीछे लगाया है वह एक धूर्त तांत्रिक है, परंतु तुम अपने प्राण से डिगने वालों में नहीं हो। अतः तुम मुझे उसके पास लेजाकर कर ही मानोगे। परंतु क्या करूं मार्ग बहुत लंबा है आसानी से कटेगा नहीं। अच्छा होगा कि हमारी राह भली बातों की चर्चा में बीत जाये। चलो इसके लिए मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ। ले, सुन।”

बहुत समय पहले की बात है एक नगरी में एक ब्राह्मण रहता था। उसके दो पुत्र थे । दोनों विवाहित थे। दोनों में कभी नहीं बनती थी क्योंकि बड़ा पुत्र तो केवल समाज से जुड़ा हुआ था परन्तु उसमें सेवा भाव नहीं था जबकि छोटा पुत्र सेवा भाव वाला था। जहां भी बुजुर्ग दिखाई देते वह उनकी सेवा में जा बैठता था। आचार विचार न मिलने के कारण वे दोनों अलग-लग रहा करते थे। पिता अपने बड़े बेटे के साथ रहता था लेकिन छोटा पुत्र अपने पिता की सेवा का जब भी मौका मिलता सेवा करना में पीछे नहीं रहता।

एक दिन जब ब्राह्मण को लगा कि अब वह मरने वाला है तो उसने अपने दोनों पुत्रों को बुलाकर कहा, " पुत्रो ! मेरे पास धन तो नहीं है परंतु मेरी इन चार बातों को हमेशा गांठ बांध लेना। भविष्य में ये बातें तुम्हारे लिए बहुत लाभदायक सिद्ध होंगी ।"

पहली हमेशा मीठा मीठा खाना 
दूसरी घर में चमड़े की एक दीवार रखना और 
तीसरी वैसे तो पत्नी को डांटना नहीं । यदि डांटना भी पड़े तो अपनी पत्नी को बांधकर डांटना।
चौथी कि अपने काम पर छाया छाया में जाना और छाया छाया में आना। 

इसके कुछ देर बाद पिता की मृत्यु हो गई। दोनोंने मिलकर पिता की अंत्येष्टि की और दोनों अपने-अपने घर को चले गए। घर पहुंच कर दोनों ने पिता की बातों पर अमल करना शुरू कर दिया। 

पिता की बातों को मानकर एक पुत्र तो दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की की ओर बढ़ता चला गया जबकि दूसरा दिन दूनी रात चौगुनी अवनति की ओर बढ़ता चला गया।

अपनी गिरती हालत देखकर एक दिन बड़कू अपने छोटे भाई छुटकू के पास गया और बोल छोटे मुझे कुछ पैसे और उधार दे दो। 
छुटकू बोला भाई उधार की बात नहीं है । यदि आपको परेशानी है तो पैसे ले जाओ। पर मैं कितनी बार आपको पैसे दे चुका हूं । आप उनका क्या करते हो ?

छुटकू के प्रश्न को सुनकर बड़कू भड़क गया और कहने लगा कि तुमने पिताजी के मरने से पहले उनसे धन ले लिया। जिसका उपयोग करके तुम आगे बढ़ते जा रहे हो। पिताजी तुमसे स्नेह करते थे इसलिए तुम्हें धन दे गए। जबकि वे मुझसे हमेशा गुस्सा रहते थे इसलिए उन्होंने मुझे धन नहीं दिया।

छुटकू बोल भाई ऐसी बात नहीं है। पिताजी के पास धन था ही कहां जो तुम्हें या मुझे देते। उन्होंने जो कहा; मैं तो बस उसी पर अमल कर रहा हूं और उन्हीं का आशीर्वाद है कि आज मेरे पास पैसे की कमी नहीं है। 

बड़कू को इस पर और गुस्सा आ गया। वह जोर-जोर से बोलने लगा। अमल तो मैं भी कर रहा हूं परंतु मैं आगे नहीं बढ़ पा रहा। जरूर तुम मुझे धोखा दे रहे हो । मैं तुम्हारी शिकायत राजा से करूंगा। यदि शिकायत से बचना चाहते हो तो पिताजी के धन में से मुझे थोड़ा धन और दे दो। 

बड़कू भैया तुम्हें जो करना है वह करो। मैं तुम्हें अब एक कोढ़ी भी नहीं देने वाला क्योंकि तुम्हें लगता है कि यह धन मेरी मेहनत की कमाई नहीं पिताजी की दिया हुआ है।

बड़कू ने अपने छोटे भाई छुटकू पर आक्षेप लगाकर राजा के सामने दोषी करार दे दिया कि मेरे छोटे भाई ने पिता से उनका धन धोखे से प्राप्त किया है। उसी धन के कारण वह उन्नति करता जा रहा है और धन न होने के कारण मैं अवनति की ओर जा रहा हूं। कृपया मेरे साथ न्याय कीजिए। पिताजी का जो धन मेरे छोटे भाई ने लिया है । उसमें से कुछ मुझे भी दिलवा दीजिए।

राजा ने छुटकू को तुरंत दरबार में बुलवा लिया और आधा धन बाड़कू को देने के लिए आदेश दिया। 

छुटकू बोला महाराज में कई बार बड़कू भाई को धन दे चुका हूं लेकिन यह आगे बढ़ ही नहीं पा रहे तो इसमें मेरा क्या दोष। अगर आपको भी लगता है कि मुझे पिता से धन मिला है तो मैं कहूंगा हां जितना धन पिता से बड़कू भाई को मिला है उतना ही मुझे मिला है ना एक कौड़ी ज्यादा ना एक कौड़ी कम। 

तो तुम्हें कौन सा धन मिला है जल्दी बताओ राजा ने छुटकू से कहा। इस पर छुटकू बोला महाराज ! पिताजी ने मुझे  और बड़कू भाईको चार नसीहत दी थीं।

राजा ने उससे पूछा कौन सी नसीहतें।

महाराज आचार और व्यवहार में अलग-अलग होने के कारण हम दोनों में कभी नहीं बनी इसलिए हम पिता के जिंदा रहते ही अलग-अलग रहने लगे। पिताजी बड़कू भैया के पास रहते थे। जब पिताजी ने देखा कि उनकी मृत्यु निकट है तो उन्होंने हमें अपने पास बुलाया और निम्न नसीहतें दीं। 

पहली हमेशा मीठा मीठा खाना 
दूसरी घर में चमड़े की एक दीवार रखना और 
तीसरी वैसे तो पत्नी को डांटना नहीं । यदि डांटना भी पड़े तो अपनी पत्नी को बांधकर डांटना।
चौथी कि अपने काम पर छाया छाया में जाना और छाया छाया में आना। 

बड़कू बोला महाराज यह झूठ बोल रहा है। यह मेरे पीछे घर पर आता था और मैंने कई बार इसे उनकी सेवा करते हुए और पैर दबाते हुए देखा है; शायद तभी उन्होंने इसे अपने गुप्त धन के बारे में बता दिया होगा।

राजा ने छुटकू को डांटते हुए कहा सच-सच बोलो वरना झूठ बोलने का दंड मृत्यु दंड होगा। 

छोटे बोला महाराज ! राजा पिता के समान होता है और पिता से झूठ बोलना बहुत बड़ा पाप होता है इसलिए मैं आपसे झूठ नहीं बोल रहा हूं । मैं सच बोल रहा हूं। पिताजी की इन चार नसीहतों पर अमल करके ही मैंने इतना धन कमाया है। मेरे घर में मेरी पत्नी और उनके पिताजी अर्थात मेरे ससुर रहते हैं आप चाहे तो उनसे भी इस बारे में पूछ सकते हैं। 

बड़कू वाला महाराज जी यह झूठ बोल रहा है। अब राजा एक धर्म संकट में फस गया कि कौन सच बोल रहा है और कौन झूठा। अब उसका पता कैसे किया जाए।

इस पर राजा ने अपने राजगुरु से कहा। गुरु देव! अब आप ही इसका फैसला करें कि कौन झूठ बोल रहा है और कौन सच। राजगुरु बोले मुझे तीन दिन का वक्त दिया जाए। मैं दूध का दूध और पानी का पानी कर दूंगा।

राजा ने दोनों को तीन दिन बाद उपस्थित होने का आदेश दिया।

कुछ गुप्तचर छुटकू के घर और कुछ बड़कू के घर गए  

उन्होंने देखा छुटकू सूरज निकलने से पहले काम पर चला जाता है और सूरज छिपाने के बाद घर आता है। वह सभी से प्रेमपूर्वक बातें करता है जिससे लोग उसे बहुत प्रसन्न रहते हैं और उसके काम का मुंह मांगा दम देते हैं। उसके घर में उसके ससुर भी है। जिनकी वह बहुत सेवा करता है और उनकी हर बात मानता है। जब कभी पति-पत्नी में बात बिगड़ जाती है तो छुटकू उसे अंदर भेज देता है ताकि अन्य लोग उनके झगड़े को नहीं जान सके।

इसके विपरीत बड़कू ने अपने घर से दुकान तक अपने खर्च पर टेंट लगवा रखा है। उसके घर में एक दीवार पर जानवरों की चमड़ी टंगी हुई है। जिससे बदबू आती है कोई भी उसके घर में रहने या जाने के लिए तैयार नहीं होता। उसकी फिजूल खर्ची और बदबू से जब भी उसकी पत्नी उसे कुछ बोलती है तो वह गुस्सा करके पहले उसको बांधता है और सबके सामने डांटता है। इससे लोग उससे दूर ही रहना पसंद करते हैं। 

गुप्तचरों ने सारी बात राजगुरु को बता दी। राजगुरु को अब समझते देर नहीं लगी।

तीन दिन बाद दोनों दरबार में उपस्थित हुए तो राजगुरु ने उनका न्याय कर दिया। दोनों उनके न्याय से संतुष्ट थे।

विक्रम आज बड़कू से ज्यादा खुश छुटकू है क्योंकि राजगुरु ने सही-सही न्याय कर दिया। और अब बड़कू को भी पता लग गया कि उससे क्या गलतियां हो रही थी। उसने अपने छोटे भाई से माफी मांगी। 

विक्रम अब तुझे बताना है की राजगुरु ने क्या न्याय किया होगा? तू तो उज्जैनी का राजा है और बहुत बड़ा ज्ञानी भी है, अगर तूने सही सही नहीं बताया तो मैं तेरे सिर टुकड़े टुकड़े कर दूंगा।

विक्रम बोला, बेताल ! छुटकू बिल्कुल सच बोल रहा था कि उसने जो धन कमाया है। वह अपने पिता की नसीहतों पर अमल करके ही कमाया है।

वेताल ने आश्चर्य से विक्रम की तरफ देखा और बोला वह कैसे?
वह ऐसे कि जब दोनों भाई दरबार से अपने-अपने घर की तरफ गए तो राजगुरु भी अपने गुप्तचर उनके पीछे लगा देते हैं कि जाओ और देखो कि उनकी दिनचर्या क्या है? 

हां बेताल ! जब राजगुरु ने गुप्तचरों की बात सुनी और दोनों की दिनचर्या जानी तो वे समझ गए। 

उन्होंने बड़कू को अपने पास बुलाया और बोले बड़कू तुम्हारे और तुम्हारे छोटे भाई की समझ में थोड़ा सा अंतर है जिसके कारण छुटकू तो आगे बढ़ता चला गया और तुम अवनति की ओर बढ़ते चले गए। 

महाराज वह कैसे बाड़कू ने पूछा 

राजगुरु बड़कू से शबोले बड़कू तुम्हारे पिताजी ने हमेशा मीठा-मीठा बोर्ड खाने के लिए कहा था इसका मतलब यह नहीं की मीठा मीठा खाया जाए इसका मतलब है सबसे मीठा मीठा बोल जाए ताकि वह अपने हो जाए जिसका अर्थ तुमने खाने से लगाए। 
उनकी दूसरी नसीहत कि घर में चमड़े की एक दीवार रखना तो तुमने मेरी हुई जीवों के चमड़े को घर की दीवार पर रखना शुरू कर दिया जिससे बदबू आती है और लोग तुमसे दूर भागते जबकि तुम्हारे भाई ने अपने ससुर को अर्थात चमड़े की एक दीवार को अपने घर में रखा वह उनकी सेवा करता और उनकी बातों को मनता
 यह उसके आगे बढ़ने का दूसरा कारण है। 

तीसरा कि जब कभी तुम्हें अपनी पत्नी पर गुस्सा आता है तुम उसे सबके सामने बांधकर डांटते हो जिससे उसे हमेशा बेज्जती महसूस होती और वह तुम्हारी किसी काम में सहायता करना के लिए तैयार नहीं होती और तुम दूसरे काम में भी पिछड़ते चले गए जबकि तुम्हारे भाई छुटकू की बीवी हर काम में उसका हाथ बंटाती है और वह आगे बढ़ते चला गया।

चौथी सर्त थी कि अपने काम पर छाया छाया में जाना और छाया छाया में आना। इसके लिए तुमने अपने घर से अपने काम तक टेंट लगवा लिया। तुम फिजूल खर्ची से और अपने उल्टी कामों के कारण अवनति की ओर बढ़ते चले गए। इस प्रकार अपनी लगन और मेहनत से काम करके छुटकू आगे बढ़ता गया। ऐसा राजगुरु के द्वारा कहा गया होगा। 

विक्रम ने जवाब दिया। बेताल ने विक्रम का मुख देखा और मुस्कुराया अपने दोनों हाथ हवा में उठाए और विक्रम के कंधे से ऊपर उठकर बोला, " विक्रम ! तूने अपनी शर्त तोड़ी तू बोला और मैं चला। 

इस प्रकार बेताल एक बार फिर से विक्रम को चकमा देकर शमशान की तरफ उड़ चला और विक्रम अपनी तलवार हाथ में लेकर उसे फिर से पकड़ने के लिए उसके पीछे हो लिए।

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