राजा विक्रमादित्य का प्रश्न दुनिया का सबसे बड़ा दानी कौन ?

राजा विक्रमादित्य का प्रश्न दुनिया का सबसे बड़ा दानी कौन ? 

राजा विक्रमादित्य की एक कथा आती है कि एक बार राजा विक्रमादित्य बहुत सारे ब्राह्मणों और संतों को भोजन के लिए बुला लिया। 

संत ब्राह्मण के भोजन करने के उपरांत विक्रमादित्य ने उनसे पूछ लिया कि दुनिया का सबसे बड़ा दानी कौन है ? दुनिया का सबसे बड़ा दान दाता कौन है ? 

जितने ब्राह्मण और संत बैठे थे सबने कह दिया दुनिया का सबसे बड़ा दानी राजा विक्रमादित्य है। दुनिया का सबसे बड़ा दानदाता राजा विक्रमादित्य अवंती का नरेश है। 

परंतु एक संत चुप बैठा था।  वह मुंह उतार कर बैठ गया। उसने नहीं कहा कि दुनिया का सबसे बड़ा दानी राजा विक्रमादित्य है। वह बोला ही नहीं । उसने नहीं बोला दुनिया का सबसे बड़ा दानदाता राजा विक्रमादित्य है। उसके मुख से न तो शब्द न हीं आवाज निकली। 

राजा विक्रमादित्य ने देखा कि एक संत बहुत देर से बैठा है चुप होकर बैठा है। सबने बोला पर य नहीं बोला । इनका मुख उतरा हुआ है। इसका चेहरा उतरा हुआ है। जरा मैं इससे पूछूंगा जरूर इसके मन में कुछ चल रहा है। 

राजा विक्रमादित्य ने उसको बुलाया और बुलाकर पूछा क्यों ब्राह्मण देवता सबने कहा कि दुनिया का सबसे बड़ा दानवीर राजा विक्रमादित्य है पर आपने नहीं बोला । क्या बात है ? आपके मन में कोई संशय है ? आपके मन में कोई प्रश्न है? आपके मन में कोई बात है ? बताओ जरा क्या बात है ? क्या संशय है ? क्या विचार है आपका ? 

राजा विक्रमादित्य की बात सुनी तो ब्राह्मण को लगा अगर मैं राजा के पक्ष की बात बोलूंगा तो मुझे इनाम मिलेगा पर राजा के विपक्ष की बात बोलूंगा तो मुझे मृत्यु दंड मिल सकता है ।

अगर मैं राजा के विपक्ष का बोल दू और राजा को बोल दू कि आप सबसे बड़े दानी नहीं हो तो हो सकता है मुझे मृत्यु दंड मिल जाए। हो सकता है कि मुझे मृत्युदंड मिले। 

नहीं नहीं महाराज ऐसी कोई बात नहीं है ? राजा विक्रमादित्य ने कहा । 

नहीं महाराज आप ब्राह्मण होकर झूठ नहीं बोल सकते ।

अगर ब्राह्मण होकर झूठ बोल रहे हो तो यह श्रेष्ठता नहीं है। आप झूठ ना बोलिए। आप सत्य बोलने का प्रयास करिए।  

आप ज्ञानवान हो आप जानते हो कि गया क्षेत्र में गौ माता ने भगवान राम जी के आगे झूठ बोला था कि सीता जी ने कोई पिंड दान नहीं किया है तो उसे मां जानकी जी का श्राप भी लगा है तभी तो आज भी गौ माता का मुख झूठा कहा जाता है इसलिए गौ दान गाय की पूंछ पकड़ कर किया जाता है। ब्राह्मण देव गया क्षत्र की फलगू नदी ने गाय के झूठ में गाय का साथ दिया तो फलगू को भी श्राप लगा। आप झूठ ना कहिए आप सत्य बोलिए। 

विक्रमादित्य के सामने, राजा के सामने ब्राह्मण खड़ा है और ब्राह्मण से राजा विक्रमादित्य पूछ रहे हैं तुम्हारे मन में कोई बात है ? जल्दी बोलो क्या बात है ? 

इतने में उसने कहा, मैं बोल तो दूंगा महाराज ! मैं बता तो दूंगा पर आप मुझ पर नाराज तो नहीं होगे। 

राजा विक्रमादित्य ने कहा मैं नाराज नहीं हूंगा। तुम बताओ बात क्या है ? 

राजा विक्रमादित्य के सामने ब्राह्मण ने कह दिया महाराज तुमने पूछा कि दुनिया का सबसे बड़े दानी कौन ? सबने कहा कि राजा विक्रमादित्य दुनिया का सबसे बड़ा दानी है पर मैं कहता हूं राजन समुद्र के उस पार एक चंद्रायन नाम का राजा रहता है। वह एक दिन में एक लाख सोने की मुद्रा का दान करता है। एक दिन में जब तक वह एक लाख सोने की मुद्रा का दान ना कर दे तब तक ना वह अन्न ग्रहण करता है ना वह पानी पीता है। 

राजा विक्रमादित्य ने सोचा कि यह ब्राह्मण सत्य बोल रहा है। राजा विक्रमादित्य ने फूल की माला ब्राह्मण को पहनाई और कहा ब्रह्मण देव तुमने हिम्मत तो करी है। आज से जब तक आप चाहे राज महल में निवास कर सकते हैं। राजमहल में उनके ठहरने की व्यवस्था की जाए कहकर विक्रमादित्य ने सभा छोड़ दी।

राजा को रात भर नींद नहीं आई कि ऐसा कौन सा राजा है जो एक लाख सोने की मुद्रा रोज देता है। उसके बाद भोजन करता है पानी पीता है। जरा मैं पता तो करूं ।

राजा ने एक सेवक के कपड़े पहने और आधी रात को समुद्र के पार चला गया। समुद्र के पार विक्रमादित्य उस राजा चंद्रायन राजमहल के पास पहुंचा और वहां के द्वार पालो से विनती करी कि मुझे राजा से मिलना है। 

विक्रमादित्य राजा से मिले परंतु इन्होंने बताया नहीं कि मैं राजा विक्रमादित्य अवंति का नरेश हूं। 

विक्रमादित्य ने राजा के पास जाकर कहा महाराज मुझे आपके आपके राज्यमें रहने के लिए काम की जरूरत है । आप मुझे काम पर रख लेंगे क्या ? मुझे यहां काम पर रख लेंगे? राजन ! आप मुझे कोई काम प्रदान कर देंगे ताकि मैंजीवन यापन कर  सकूं। 

चंद्रायन ने पूछा तुम क्या काम कर सकते हो बताओ ? क्या काम करोगे तुम वो बताओ ?

राजा विक्रमादित्य राजा चंद्रायन के सामने एक सेवक के वेश में खड़े होकर कहते हैं। महाराज ! जो कोई नहीं कर सकता वह काम मैं कर सकता हूं। ऐसा विक्रमादित्य ने क्यों कहा यहतो सभी जानते हैं क्योंकि राजा विक्रमादित्य के पास में बेताल था। वह बेताल को बोल देते तो सब काम हो जाता। 

ठीक है ! जरूरत पड़ने पर तुम ही काम दे दिया जाएगा। चंद्रायण को प्रसन्नता हो गई कि ऐसा सेवक मुझे मिल गया जो वह काम कर सकता है जिसे कोई नहीं कर सकता। उसे अपनेखास महल का द्वारपाल लगा दिया। 

उसको दरवाजे पर खड़ा कर दिया राजा विक्रमादित्य दरवाजे पर खड़े थे । सबेरे सबेरे ब्रह्म मुहूर्त में राजा चंद्रायन उठते और उठकर नहाने के लिए समुद्र पर जाते और सोनीसे भरी मुद्राओं की एक थैली लेकर आते। और उसे दान कर देते। धीरे-धीरे विक्रमादित्य राजा चंद्रयान के विश्वासपत्र बन गए।

एक दिन विक्रमादित्यने स्वर्ण मुद्राओं से भरी थली पाने का रहस्य जानने का निर्णय लिया। राजा विक्रमादित्य दरवाजे पर खड़े थे । सबेरे सबेरे ब्रह्म मुहूर्त में राजा चंद्रायन उठे और उठकर नहाने के लिए समुद्र पर चले तो विक्रमादित्य ने देखा। 

कि राजा चंद्रयान के समुद्र में नहाकर पास ही स्थित एक देवी के मंदिर में जाते हैं । विक्रमादित्यभी उनके पीछे-पीछे मंदिर में प्रवेश कर जाते हैं। विक्रमादित्य ने देखा कि मंदिर में जाकर राजा ने मां को प्रणाम किया । उन्होंनेदेखाकि पास ही एक बड़े से कड़ाही में तेल उबल रहा है। विक्रमादित्य पूरे मंदिर का जायजा लेने लगे। 

तभी उन्होंने देखा कि देवी को प्रणाम करने के बाद राजा चंद्रायन खोलते हुए तेल अर्थात उबलते हुए तेल के कड़ाही में  बैठ जाते हैं। विक्रमादित्य ने देखा कि राजा चंद्रायन तड़फ रहे हैं। विक्रमादित्यसे उनका वह कष्ट देखा नहीं गया। विक्रमादित्य है आंखें बंद कर ली।

धीरे-धीरे तेल में राजा चंद्रायण का पूरा शरीर जल कर तल जाता है । पूरा शरीर पक जाता तब मंदिर से कई योगिनियां आकर उसको नोच नोच कर खाती है। यह दृश्य बड़ा ही वीभत्स था। कुछ समय में उनकी हड्डियों का ढांचा मात्र वहां पर पड़ा था। विक्रमादित्य अपने स्थान पर स्तंभित खड़े यह सब देख रहे थे। 

उसी समय देवी मां बाहर निकलती हैं। वे अपने हाथ में जल लेकर राजा चंद्रायन पर छीट देती हैं और राजा चंद्रायन वापस जीवित हो जाता है। देवी उसको एक लाख सोने की मुद्राएं देकर चली जाती हैं। राजा वो सोने की मुद्राएं लेकर अपने राज्य लौट आता है।

विक्रमादित्य ने यह सब देख लिया। राजा विक्रमादित्य जान गए कि मुद्रा आती कहां से हैं। विक्रमादित्य ने विचार करा बस यही जानना था कि राजा चंद्रयान के पास दान देने के लिए मुद्रा आती कहां से हैं। 

राजा विक्रमादित्य सबेरे दूसरे दिन राजा चंद्रयान के जागने से पहले खुद पहुंच गया। राजा चंद्रयान उठते उससे पहले विक्रमादित्य मंदिर परिसर में पहुंच गया। विक्रमादित्य ने  बिना समय गंवाए स्नान करा । देवी को प्रणाम करा और खोलते तेल में खुद बैठ गया । उसका शरीर जला । जलने के बाद योगनया ने अपनी भूख मिटाई और देवी ने प्रकट होकर जल छींटा विक्रमादित्य जीवित हो गया। जैसे ही विक्रमादित्य जीवित हुआ देवी ने एक लाख सोने की मुद्रा राजा विक्रमादित्य को देना चाहीं। राजा विक्रमादित्य ने कहा मां मुझे ये सोने की मुद्राएं नहीं चाहिए। राजा फिर गया, नहाया, नहाकर के फिर खोलते तेल में कूद गया । देवी ने फिर जीवित कर दिया देवी ने फिर एक लाख सोने की मुद्रा दी राजा ने कहा मुझे सोने की मुद्रा नहीं चाहिए। वह फिर गया, फिर नहाया और खोलते हुए तेल में फिर कूद गया। राजा विक्रमादित्य खोलते हुए तेल में बार-बार कूद रहा था और देवी की मुद्राएं लेने से मना कर रहा था। देवी ने राजा को ध्यान सेदे खा तो वे समझ गई यह विक्रमादित्य है।

राजा विक्रमादित्य खोलते हुए तेल में जब आठवी बार कूदने जा रहा था। तब देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया अरे विक्रमादित्य मैं तुझे पहचान गई। तुझे चाहिए क्या वो तो बोल राजा विक्रमादित्य ने कहा मां तू मुझ पर दया करती है ना। तो जिस थैली में से तू एक लाख मुद्राएं रोज देती है। वो थैली मुझे दे दे। मां वो थैली मुझे दे दो। जिससे थैली से तू एक लाख मुद्रा रोज देती है। 

यह है संभव नहीं है। देवीने कहा। तो फिर मुझे उस कढ़ाई में फिरसे कूदने दो। में उसमें तब तक कुदता रहूंगा जब तक मां का दिल ना पिघल जाए।

देवी बोली विक्रमादित्य मैं तेरे दृढ निश्चय को समझ गई। यह ले कहते हुए राजा विक्रमादित्य के हाथ में जगत जननी दुर्गा भवानी ने थैली रख दी। उसी समय मंदिर समुद्र में डूब गया। उसी समय मंदिर गायब हो गया। और राजा विक्रमादित्य राजमहल लौट आए।

इतने में चंद्रायन राजा आए चंद्रायन राजा ने देखा कि आज तो देवी का मंदिर ही नहीं है। वह समुद्र में चला गया। अब ना तो कोई खोलता हुआ तेल है ना कुछ है। राजा चंद्रयान बहुत उदास हुए। राजा चंद्रायन घर पहुंचे और उनकी आंख में जल पड़ा था। पलंग पर लेट गए मेरा नियम टूट जाएगा इस चिंता में बीमार पड़ गए। मैं एक लाख सोने की मुद्राएं रोज दान करता था। मेरा पूरा की पूरा नियम आज समाप्त हो जाएगा।

मैं क्या करूं ? अब क्या करा जाए ? कैसे करुं ? राजा के बीमार होने की सूचना पूरे राज्य में आग की तरह फ़ैल गई। सूचना हो गई पूरे नगर और पूरे नगर में जब सूचना हुई पूरे नगर में जब सूचना हुई सारे नगर में सूचना पहुंच गई और पूरे नगर में जब सूचना पहुंची सूचना होने पर मालूम पड़ा कि राजा बीमार पड़ गया। तो पूरी राज्यकी प्रजा राजा को देखने के लिए उमड़ पड़ी।

विक्रमादित्य राजा के पास में पहुंचे और राजा से पूछा महाराज आप बीमार क्यों पड़े हो ? आपकी बीमारी का कारण क्या है। 

सेवक रहने दो तुम मेरी कुछ सहायता नहीं कर सकते विक्रमादित्य बोला महाराज आपने मुझे जिस काम के लिए रखा है। वह भूल गए क्या ?

महाराज में वह काम कर सकता हूं जो कोई नहीं कर सकता। राजा चंद्रायण ने अपनी पूरी कहानी राजा विक्रमादित्य को बता दी। 

विक्रमादित्य ने कहा महाराज बीमार मत होइए । महाराज आपको एक लाख सोने की मुद्राएं रोज दान करनी है। वह कीजिए। महाराज यह थैली लीजिए । इस थैली से रोज एक लाख मुद्राएं निकाल लीजिए और खुशी खुशी दान कर दीजिए। 

राजा चंद्रायण ने विक्रमादित्य से पूछा तुम्हारे पास यह थैली कैसे आई ? महाराज ! जब आप कल सुबह मंदिर गए तो मैं भी आपके पीछे-पीछे मंदिर गया। आप मंदिर में प्रवेश कर गए और मैं दरवाजे के पीछे छिपे कर खड़ा हो गया था। मैंने देखा आप देवी को प्रसन्न करने के लिए कैसे खोलते हुए तेल में उतर गए उस वक्त आप पीड़ा और दर्द से चीख रहे थे। आपका दर्द मुझसे सहन नहीं हुआ इसलिए देवी मां की आराधना करकर वो थैली में आपके लिए लेकर आ गया। ये लो थैली आपके पास में रखी रहा हूं। महाराज ! अब मुझे अपने घर जाने की आज्ञा दीजिए।

राजा चंद्रयांग बोले एक मामूली सेवक यह सब नहीं कर सकता। आप कौन हैं? कृपया बताएं। बस इतना याद रखिएकि मैं आपका एक मामूली सा सेवक हूं जिसने आपका नमक खाया और उसका कर्ज उतारा। राजा चंद्रायन ने विक्रमादित्य को बहुत सा धन देने की कोशिश की परंतु विक्रमादित्य ने हाथ जोड़कर मना कर दिया। और राजा विक्रमादित्य अपने राज्य अवंतिका की ओर चल दिए।

ब्राह्मण को सूचना मिली कि राजा चंद्रायण को सोना देने वाली थैली विक्रमादित्य दान दे आए हैं। तब राजा के दरबार में आकर ब्राह्मण चिल्लाकर बोला कि आज मैं जान गया हूं कि राजा विक्रमादित्य जैसा दानी दुनिया में कोई नहीं हो सकता। 

विक्रमादित्य वो दानी हैं जिनसे दूसरे का दुख देखा नहीं जाता। आज से पहले राजा चंद्रयान महादानी हुआ करते थे। और हमारे महाराज ने उनकोभी एक लाख सोने की मुद्राएं रोज देनेवाली थैली दान कर दुनिया के सबसे बड़े महादानी बन गए हैं।

शिव महापुराण से 

Day - 02 ll श्री शिव महापुराण कथा ll पूज्य पण्डित प्रदीप जी मिश्रा (सीहोर वाले) ll धमतरी, छत्तीसगढ़ 

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