112. विक्रम बैताल || कहानी 12 || लोगों का विश्वास
112. विक्रम बैताल || कहानी 12 || लोगों का विश्वास
उचित समय आने पर राजा अकेला योगी के मठ पर जा पहुँचा। योगी ने उसे अपने पास बिठा लिया। थोड़ी देर बैठकर राजा विक्रम ने पूछा, “महाराज, मेरे लिए क्या आज्ञा है?”
योगी ने कहा, “राजन्, यहाँ से दक्षिण दिशा में दो कोस की दूरी पर शमशान में एक सिरस के पेड़ पर एक मुर्दा उल्टा लटका हुआ है। उसे मेरे पास ले आओ, तब तक मैं यहाँ पूजा करता हूँ।”
यह सुनकर राजा विक्रम अपने वचन को पूरा करने के लिए शमशान की ओर चल दिया। बड़ी भयंकर रात थी। चारों ओर अँधेरा फैला था। पानी बरस रहा था। भूत-प्रेत शोर मचा रहे थे। साँप आ-आकर पैरों में लिपटते थे। लेकिन हर बाधा को दूर करते हुए निडर राजा विक्रम आगे बढ़ता गया।
जब वह शमशान में पहुँचा तो देखता क्या है कि शेर दहाड़ रहे हैं, हाथी चिंघाड़ रहे हैं, भूत-प्रेत आदमियों को मार रहे हैं। राजा बेधड़क चलता गया और सिरस के पेड़ के पास पहुँच गया। पेड़ पर रस्सी से बँधा मुर्दा लटक रहा था। पेड़ जड़ से फुनगी तक आग से दहक रहा था। राजा ने सोचा, हो-न-हो, यह वही योगी है, जिसकी बात देव ने बतायी थी। राजा पेड़ पर चढ़ गया और तलवार से रस्सी काट दी। मुर्दा नीचे गिर पड़ा और दहाड़ मार-मार कर रोने लगा।
उसने राजा से पूछा, “तू कौन है?”
"विक्रम", राजा ने जवाब दिया।
राजा का इतना बोला ही था कि वह मुर्दा खिलखिकर हँस पड़ा, और तभी वह मुर्दा हवा में उड़ा और पुनः पेड़ पर जा लटका।
राजा को बड़ा अचरज हुआ। तभी सिद्ध योगी की आवाज सुनाई दी, " विक्रम ! इससे बात मत करो वरना यह पुनः पेड़ पर जा लटकेगा। समय बहुत कम है जल्दी करो।"
राजा पुनः चढ़कर ऊपर गया और रस्सी काट, मुर्दे को बगल में दबा, नीचे आया। मुर्दा पुनः बोला, “बता, तू कौन है?”
राजा चुप रहा। मुर्दा बार-बार बोलता रहा परंतु राजा ने जवाब नहीं दिया।
नीचे उतर कर राजा ने उसके दोनों हाथ पकड़े और अपनी पीठ पर लाद लिया और मुर्दे को योगी के पास ले चला। रास्ते में वह मुर्दा बोला, “मैं बेताल हूँ। तू कौन है और मुझे कहाँ ले जा रहा है? अब तू आराम से मेरे प्रश्नों का जवाब दे सकता है।”
बेताल बोला, “राजन ! मैं एक शर्त पर चलूँगा कि तू रास्ते में अब के बाद कुछ भी नहीं बोलेगा। यदि तेरे मुंह से एक शब्द भी निकला तो मैं लौटकर पेड़ पर जा लटकूँगा।
राजन! जिसने तुम्हें मेरे पीछे लगाया है वह एक धूर्त तांत्रिक है, परंतु तुम अपने प्राण से डिगने वालों में नहीं हो। अतः तुम मुझे उसके पास लेजाकर कर ही मानोगे। परंतु क्या करूं मार्ग बहुत लंबा है आसानी से कटेगा नहीं। अच्छा होगा कि हमारी राह भली बातों की चर्चा में बीत जाये। चलो इसके लिए मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ। ले, सुन।”
बहुत समय पहले की बात है एक नगरी में एक किसान रहता था।
उसने उनकी पोटली हथियाने की साजिश रची। एक सुबह उसने जोर- जोर से चिल्लाना शुरू कर दिया, “हाय मैं मारा गया। मेरे एक हजार दीनार चोरी हो गए।"
जहाज के कर्मचारियों ने कहा, "तुम घबराते क्यों हो। जिसने भी तुम्हारे दीनार चुराए होंगे, वह यहीं होगा। हम एक-एक की तलाशी लेते हैं। वह अवश्य ही पकड़ा जाएगा।" यात्रियों की तलाशी शुरू हुई। जब बुखारी की बारी आई तो जहाज के कर्मचारियों और यात्रियों ने उनसे कहा, "अरे साहब, आपकी क्या तलाशी ली जाए। आप पर तो शक करना ही गुनाह है।" यह सुनकर बुखारी बोले, "नहीं, जिसके चोरी हुए हैं उसके दिल में शक बना रहेगा। इसलिए मेरी भी तलाशी ली जाए।" बुखारी की तलाशी ली गई।
उनके पास से कुछ नहीं मिला। दो दिनों के बाद उसी यात्री ने बुखारी से पूछा, "आपके पास तो एक हजार दीनार थे, वे कहां गए?" बुखारी ने कहा, "उन्हें मैंने समुद्र में फेंक दिया। तुम जानना चाहते हो क्यों ? मैंने जीवन में दो ही दौलत कमाई है? एक ईमानदारी और दूसरा लोगों का विश्वास। अगर मेरे पास से दीनार बरामद होते और मैं कहता कि ये मेरे हैं तो लोग यकीन भी कर लेते, लेकिन फिर भी मेरी ईमानदारी और सच्चाई पर लोगों का शक बना ही रहता।"
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